
उत्तराखंड पुलिस मुख्यालय के एक हालिया आदेश ने प्रदेश के करीब तीन हजार दरोगाओं के भविष्य को लेकर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। वर्षों से थानों का उच्चीकरण तो होता रहा, लेकिन दरोगाओं की पदोन्नति को लेकर न सरकार और न ही विभागीय स्तर पर कोई ठोस नीति बनाई गई। हैरानी की बात यह है कि इन दरोगाओं के प्रमोशन से सरकार के खजाने पर कोई खास अतिरिक्त आर्थिक भार भी नहीं पड़ने वाला, इसके बावजूद लंबे समय से पदोन्नति की प्रक्रिया ठप पड़ी हुई है। इसी को लेकर दरोगा वर्ग में भारी रोष देखा जा रहा है और इसके पीछे उच्च अधिकारियों की अनदेखी को मुख्य वजह बताया जा रहा है।
काशीपुर किसान आत्महत्या प्रकरण के बाद पुलिस मुख्यालय स्तर से प्रदेश की दोनों रेंज को जारी एक आदेश ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। आदेश के अनुसार अब इंस्पेक्टर स्तर के घोषित थानों में केवल इंस्पेक्टर की ही तैनाती की जाएगी। कोतवाली में पहले से ही इंस्पेक्टर की पोस्टिंग होती रही है, लेकिन अब इस फैसले के बाद दरोगाओं की भूमिका केवल विवेचना और चालान तक सीमित रह जाने की आशंका जताई जा रही है।
दरोगाओं का कहना है कि वर्षों का अनुभव और फील्ड नॉलेज होने के बावजूद उन्हें नेतृत्व और थाना संचालन का अवसर नहीं मिलेगा। इससे न केवल उनके मनोबल पर नकारात्मक असर पड़ेगा, बल्कि बेहतर पुलिसिंग और ‘मित्र पुलिस’ की अवधारणा को भी झटका लगेगा।
प्रमोशन की राह में अटका सिस्टम
बीते वर्षों में प्रदेश के कई थानों का उच्चीकरण कर उन्हें इंस्पेक्टर स्तर का घोषित कर दिया गया, लेकिन उसी अनुपात में इंस्पेक्टर के पद नहीं बढ़ाए गए। यही कारण है कि दरोगाओं की पदोन्नति की प्रक्रिया ठहर गई। विभागीय सूत्रों के अनुसार 2008 बैच के महज 20 फीसदी से कुछ अधिक दरोगाओं को ही अब तक इंस्पेक्टर पद पर पदोन्नति मिल सकी है। इस बैच के कई दरोगा 50 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं और कुछ सेवानिवृत्ति की दहलीज पर खड़े हैं।
हालांकि बीते वर्ष उत्तराखंड पुलिस में विभिन्न पदों पर बंपर पदोन्नतियां हुईं, लेकिन दरोगा संवर्ग खुद को अब भी उपेक्षित महसूस कर रहा है। तुलना उत्तर प्रदेश से की जा रही है, जहां 2013 बैच तक के दरोगा इंस्पेक्टर बन चुके हैं, जबकि उत्तराखंड में 2002 बैच के प्रमोशन की प्रक्रिया भी काफी देर से पूरी हो पाई।
उच्च अधिकारियों पर अनदेखी के आरोप
दरोगाओं का आरोप है कि प्रमोशन में देरी के लिए नीतिगत अड़चन से ज्यादा जिम्मेदारी उच्च पुलिस अधिकारियों की है, जिन्होंने समय रहते कैडर रिव्यू और पद सृजन को गंभीरता से नहीं लिया। जबकि जानकारों का कहना है कि प्रमोशन से केवल पदनाम और जिम्मेदारी बदलती है, वेतनमान में बड़ा अंतर न होने के कारण सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ भी नहीं पड़ता।
बढ़ता आक्रोश, सीएम से उम्मीद
नए आदेशों से न केवल पदोन्नति बल्कि तैनाती के अवसर भी लगभग समाप्त होते नजर आ रहे हैं। इसे लेकर दरोगा वर्ग में अपने वरिष्ठ अधिकारियों और सरकार के प्रति आक्रोश गहराता जा रहा है। अंदरखाने इस मुद्दे को उच्च स्तर तक उठाने की चर्चाएं तेज हैं।
ऐसे में कई पुलिस कर्मी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं। चूंकि मुख्यमंत्री स्वयं राज्य के गृहमंत्री भी हैं, इसलिए दरोगाओं को उम्मीद है कि वे इस लंबे समय से चली आ रही समस्या का समाधान निकालेंगे। यदि जल्द ठोस निर्णय नहीं लिया गया तो जानकारों का मानना है कि इसका असर उत्तराखंड पुलिस की साख, कार्यक्षमता और मनोबल तीनों पर पड़ना तय है।




